में बस बहती एक लहर

सब कहेते हे ज़िंदगी एक समन्दर हे
तैर के जाना हे नंद तो डुब जाना हे

पर में वो तूफ़ानी लहर हू्
जो जौर से गीरती फिर उठती हे
मानो तो गरजति जैसे शैर सी डराती
सुनो तो मनभावन सा अविरत संगित  

जो सूरज की रौशनी में चमके जैसे सोना
चंदा की शीतल छाँव में जैसे चाँदी
जो भी आये किनारे पे देखके मन वेहलाके
खैल जाये, मन मचलाये

सबसे मीलती सबसे जुलती संभलती
सूरज चाँद तारे हवा आसमाँ पंछी नदियाँ
जो बहे सफ़र में साथ मनभावन हो

अगर चाहे चट्टान कोई रोकना, काट लू मै
अगर थक जाऊ तो ठेहर जाऊँ तालाब सा

हज़ार बार गिरके उठके मिलौं दूर
वढती मंझिल की और ही ढूँढती
जब मीलेगा किनारा मुझे
एक हो जाउ प्यार से भीगा करके

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